Ye Duriyaan....

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Sunday, July 3, 2011

kal tak

कल पत्थर की तरह था में
परसों था लोहे की तरह
कल धुल की तरह हो जाऊ
परसों धागे की तरह हो जाऊ
रुई के गुण गाऊ !

अगले महीने आटे की तरह
साल भर बाद पानी की तरह
आगे हवा की तरह हो जाऊ
फिर आग की तरह हो जाऊ
धधक कर ज़लू- जलाऊ 

बहुत पहले खेत की तरह हो गया में  
कभी आकाश की तरह फैल जाऊ
बदल बन जाऊ
उमड़ घुमड़ कर गरज बरस जाऊ

रोज़ रोज़ हर पल
उगता ढलता जा रहा हु
जितना चलता जा रहा हु
उतना बदलता जा रहा हु !

3 comments:

Anonymous said...

Kal ka nazriya aaj purana ho jata he, fir badalkar wo naye mayne gadh jata he.... Its rule of nature...@aamir

monika said...

tooooooooooooooooooo gud

monika said...

tooooooooooooooooo gud